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बस यूँ ही वक़्त गुज़रता चला ग्या, ज़ख़्म तो गहरा था पैर भरता चला ग्या, कोशीशे बहुत की यारों ने बचाने की, पैर इश्क़ का मर्ज़ था बढ़ता चला ग्या, ना दीन की गर्मी की और ना रात के अंधेरे की परवाह की, जाने कहाँ का मुसाफ़िर था बढ़ता चला ग्या, कोशीशे बहुत की उस शाख़स को रोकने की, जाने क्या रेत का ब्ना था, मुट्ठी से फिसलता चला ग्या,
हम ही थे जो रह ग्ये उस ज़माने मे, और ज़माना था की बदलता चला ग्या,प्र वो शख्स भी अजीब था, मुक़ार्ता चला ग्या,हाथ जोड़े मिन्नते की, दुहाई भी दी, जाने कैसा मिज़ाज था उसका बिगड़ता चला ग्या,,,
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